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Culture

Indian History / भारतीय इतिहास

Ancient History / प्राचीन इतिहास

भारत का इतिहास और संस्‍कृति गतिशील है और यह मानव सभ्‍यता की शुरूआत तक जाती है। यह सिंधु घाटी की रहस्‍यमयी संस्‍कृति से शुरू होती है और भारत के दक्षिणी इलाकों में किसान समुदाय तक जाती है। भारत के इतिहास में भारत के आस पास स्थित अनेक संस्‍कृतियों से लोगों का निरंतर समेकन होता रहा है। उपलब्‍ध साक्ष्‍य सुझाते हैं कि लोहे, तांबे और अन्‍य धातुओं के उपयोग काफी शुरूआती समय में भी भारतीय उप महाद्वीप में प्रचलित थे, जो दुनिया के इस हिस्‍से द्वारा की गई प्रगति का संकेत है। चौंथी सहस्राब्दि बी. सी. के अंत तक भारत एक अत्‍यंत विकसित सभ्‍यता के क्षेत्र के रूप में उभर चुका था।

सिंधु घाटी की सभ्‍यता

भारत का इतिहास सिंधु घाटी की सभ्‍यता के जन्‍म के साथ आरंभ हुआ, और अधिक बारीकी से कहा जाए तो हड़प्‍पा सभ्‍यता के समय। यह दक्षिण एशिया के पश्चिमी हिस्‍से में लगभग 2500 बीसी में फली फूली, जिसे आज पाकिस्‍तान और पश्चिमी भारत कहा जाता है। सिंधु घाटी मिश्र, मेसोपोटामिया, भारत और चीन की चार प्राचीन शहरी सबसे बड़ी सभ्‍यताओं का घर थी। इस सभ्‍यता के बारे में 1920 तक कुछ भी ज्ञात नहीं था, जब भारतीय पुरातात्विक विभाग ने सिंधु घाटी की खुदाई का कार्य आरंभ किया, जिसमें दो पुराने शहरों अर्थात मोहन जोदाड़ो और हड़प्‍पा के भग्‍नावशेष निकल कर आए। भवनों के टूटे हुए हिस्‍से और अन्‍य वस्‍तुएं जैसे कि घरेलू सामान, युद्ध के हथियार, सोने और चांदी के आभूषण, मुहर, खिलौने, बर्तन आदि दर्शाते हैं कि इस क्षेत्र में लगभग पांच हजार साल पहले एक अत्‍यंत उच्‍च विकसित सभ्‍यता फली फूली।

सिंधु घाटी की सभ्‍यता मूलत: एक शहरी सभ्‍यता थी और यहां रहने वाले लोग एक सुयोजनाबद्ध और सुनिर्मित कस्‍बों में रहा करते थे, जो व्‍यापार के केन्‍द्र भी थे। मोहन जोदाड़ो और हड़प्‍पा के भग्‍नाव‍शेष दर्शाते हैं कि ये भव्‍य व्‍यापारिक शहर वैज्ञानिक दृष्टि से बनाए गए थे और इनकी देखभाल अच्‍छी तरह की जाती थी। यहां चौड़ी सड़कें और एक सुविकसित निकास प्रणाली थी। घर पकाई गई ईंटों से बने होते थे और इनमें दो या दो से अधिक मंजिलें होती थी।

उच्‍च विकसित सभ्‍यता हड़प्‍पा में अनाज, गेहूं और जौ उगाने की कला ज्ञात थी, जिससे वे अपना मोटा भोजन तैयार करते थे। उन्‍होंने सब्जियों और फल तथा मांस, सुअर और अण्‍डे का सेवन भी किया। साक्ष्‍य सुझाव देते हैं कि ये ऊनी तथा सूती कपड़े पहनते थे। वर्ष 1500 से बी सी तक हड़प्‍पन सभ्‍यता का अंत हो गया। सिंधु घाटी की सभ्‍यता के नष्‍ट हो जाने के प्रति प्रचलित अनेक कारणों में शामिल है आर्यों द्वारा आक्रमण, लगातार बाढ़ और अन्‍य प्राकृतिक विपदाओं का आना जैसे कि भूकंप आदि।

वैदिक सभ्‍यता

प्राचीन भारत के इतिहास में वैदिक सभ्‍यता सबसे प्रारंभिक सभ्‍यता है जिसका संबंध आर्यों के आगमन से है। इसका नामकरण हिन्‍दुओं के प्रारम्भिक साहित्‍य वेदों के नाम पर किया गया है। वैदिक सभ्‍यता सरस्‍वती नदी के किनारे के क्षेत्र जिसमें आधुनिक भारत के पंजाब और हरियाणा राज्‍य आते हैं, में विकसित हुई। वैदिक आर्यों और हिन्‍दुओं का पर्यायवाची है, यह वेदों से निकले धार्मिक और आध्‍यात्मिक विचारों का दूसरा नाम है। बड़े पैमाने पर स्‍वीकार दृष्टिकोणों के अनुसार आर्यों का एक वर्ग भारतीय उप महाद्वीप की सीमाओं पर ईसा पूर्व 2000 के आसपास पहुंचा और पहले पंजाब में बस गया, और यही ऋगवेद के स्‍त्रोतों की रचना की गई।

आर्य जन जनजातियों में रहते थे और संस्‍कृत भाषा का उपयोग करते थे, जो भाषाओं के भारतीय - यूरोपीय समूह के थे। क्रमश: आर्य स्‍थानीय लोगों के साथ मिल जुल गए और आर्य जनजातियों तथा मूल अधिवासियों के बीच एक ऐतिहासिक संश्‍लेषण हुआ। यह संश्‍लेषण आगे चलकर हिन्‍दुत्‍व कहलाया। इस अवधि के दो महान ग्रंथ रामायण और महाभारत थे।

बौद्ध युग

भगवान गौतम बुद्ध के जीवनकाल में, ईसा पूर्व 7 वीं और शुरूआती 6 वीं शताब्दि के दौरान सोलह बड़ी शक्तियां (महाजनपद) विद्यमान थे। अति महत्‍वपूर्ण गणराज्‍यों में कपिलवस्‍तु के शाक्‍य और वैशाली के लिच्‍छवी गणराज्‍य थे। गणराज्‍यों के अलावा राजतंत्रीय राज्‍य भी थे, जिनमें से कौशाम्‍बी (वत्‍स), मगध, कोशल, और अवन्ति महत्‍वपूर्ण थे। इन राज्‍यों का शासन ऐसे शक्तिशाली व्‍यक्तियों के पास था, जिन्‍होंने राज्‍य विस्‍तार और पड़ोसी राज्‍यों को अपने में मिलाने की नीति अपना रखी थी। तथापि गणराज्‍यात्‍मक राज्‍यों के तब भी स्‍पष्‍ट संकेत थे जब राजाओं के अधीन राज्‍यों का विस्‍तार हो रहा था।

बुद्ध का जन्‍म ईसा पूर्व 560 में हुआ और उनका देहान्‍त ईसा पूर्व 480 में 80 वर्ष की आयु में हुआ। उनका जन्‍म स्‍थान नेपाल में हिमालय पर्वत श्रंखला के पलपा गिरि की तलहटी में बसे कपिलवस्‍तु नगर का लुम्बिनी नामक निकुंज था। बुद्ध, जिनका वास्‍‍तविक नाम सिद्धार्थ गौतम था, ने बुद्ध धर्म की स्‍थापना की जो पूर्वी एशिया के अधिकांश हिस्‍सों में एक महान संस्‍कृति के रूप में वि‍कसित हुआ।

सिकंदर का आक्रमण

ईसा पूर्व 326 में सिकंदर सिंधु नदी को पार करके तक्षशिला की ओर बढ़ा व भारत पर आक्रमण किया। तब उसने झेलम व चिनाब नदियों के मध्‍य अवस्थ्ति राज्‍य के राजा पौरस को चुनौती दी। यद्यपि भारतीयों ने हाथियों, जिन्‍हें मेसीडोनिया वासियों ने पहले कभी नहीं देखा था, को साथ लेकर युद्ध किया, परन्‍तु भयंकर युद्ध के बाद भारतीय हार गए। सिकंदर ने पौरस को गिरफ्तार कर लिया, तथा जैसे उसने अन्‍य स्‍थानीय राजाओं को परास्‍त किया था, की भांति उसे अपने क्षेत्र पर राज्‍य करने की अनुमति दे दी।

दक्षिण में हैडासयस व सिंधु नदियों की ओर अपनी यात्रा के दौरान, सिकंदर ने दार्शनिकों, ब्राह्मणों, जो कि अपनी बुद्धिमानी के लिए प्रसिद्ध थे, की तलाश की और उनसे दार्शनिक मुद्दों पर बहस की। वह अपनी बुद्धिमतापूर्ण चतुराई व निर्भय विजेता के रूप में सदियों तक भारत में किवदंती बना रहा।

उग्र भारतीय लड़ाके कबीलों में से एक मालियों के गांव में सिकन्‍दर की सेना एकत्रित हुई। इस हमले में सिकन्‍दर कई बार जख्‍मी हुआ। जब एक तीर उसके सीने के कवच को पार करते हुए उसकी पसलियों में जा घुसा, तब वह बहुत गंभीर रूप से जख्‍मी हुआ। मेसेडोनियन अधिकारियों ने उसे बड़ी मुश्किल से बचाकर गांव से निकाला।

सिकन्‍दर व उसकी सेना जुलाई 325 ईसा पूर्व में सिंधु नदी के मुहाने पर पहुंची, तथा घर की ओर जाने के लिए पश्चिम की ओर मुड़ी।

Medieval History / मध्ययुगीन इतिहास
आने वाला समय जो इस्‍लामिक प्रभाव और भारत पर शासन के साथ सशक्‍त रूप से संबंध रखता है, मध्‍य कालीन भारतीय इतिहास तथाकथित स्‍वदेशी शासकों के अधीन लगभग तीन शताब्दियों तक चलता रहा, जिसमें चालुक्‍य, पल्‍व, पाण्‍डया, राष्‍ट्रकूट शामिल हैं, मुस्लिम शासक और अंतत: मुगल साम्राज्‍य। नौवी शताब्‍दी के मध्‍य में उभरने वाला सबसे महत्‍वपूर्ण राजवंश चोल राजवंश था।

पाल

आठवीं और दसवीं शताब्‍दी ए.डी. के बीच अनेक शक्तिशाली शासकों ने भारत के पूर्वी और उत्तरी भागों पर प्रभुत्‍व बनाए रखा। पाल राजा धर्मपाल, जो गोपाल के पुत्र थे, में आठवीं शताब्‍दी ए.डी. से नौवी शताब्‍दी ए.डी. के अंत तक शासन किया। धर्मपाल द्वारा नालंदा विश्‍वविद्यालय और विक्रमशिला विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना इसी अवधि में की गई।

सेन

पाल वंश के पतन के बाद सेन राजवंश ने बंगाल में शासन स्‍थापित किया। इस राजवंश के स्‍थापक सामंत सेन थे। इस राजवंश के महानतम शासक विजय सेन थे। उन्‍होंने पूरे बंगाल पर कब्‍जा किया और उनके बाद उनके पुत्र बल्‍लाल सेन ने राज किया। उनका शासन शांतिपूर्ण रहा किन्‍तु इसने अपने विचारधाराओं को समूचा बनाए रखा। वे एक महान विद्वान थे तथा उन्‍होंने ज्‍योतिष विज्ञान पर एक पुस्‍तक सहित चार पुस्‍तके लिखी। इस राजवंश के अंतिम शासक लक्ष्‍मण सेन थे, जिनके कार्यकाल में मुस्लिमों ने बंगाल पर शासन किया और फिर साम्राज्‍य समाप्‍त हो गया।

प्रतिहार

प्रतिहार राजवंश के महानतम शासक मि‍हिर भोज थे। उन्‍होंने 836 में कन्‍नौज (कान्‍यकुब्‍ज) की खोज की और लगभग एक शताब्‍दी तक प्रतिहारों की राजधानी बनाया। उन्‍होंने भोजपाल (वर्तमान भोपाल) शहर का निर्माण किया। राजा भोज और उनके अन्‍य सहवर्ती गुजर राजाओं को पश्चिम की ओर से अरब जनों के अनेक आक्रमणों का सामना करना पड़ा और पराजित होना पड़ा।

वर्ष 915 - 918 ए.डी. के बीच कन्‍नौज पर राष्‍ट्रकूट राजा ने आक्रमण किया। जिसने शहर को विरान बना दिया और प्रतिहार साम्राज्‍य की जड़ें कमजोर दी। वर्ष 1018 में कन्‍नौज ने राज्‍यपाल प्रतिहार का शासन देखा, जिसे गजनी के महमूद ने लूटा। पूरा साम्राज्‍य स्‍वतंत्रता राजपूत राज्‍यों में टूट गया।

राष्‍ट्रकूट

इस राजवंश ने कर्नाटक पर राज्‍य किया और यह कई कारणों से उल्‍लेखनीय है। उन्‍होंने किसी अन्‍य राजवंश की तुलना में एक बड़े हिस्‍से पर राज किया। वे कला और साहित्‍व के महान संरक्षक थे। अनेक राष्‍टकूट राजाओं द्वारा शिक्षा और साहित्‍य को दिया गया प्रोत्‍साहन अनोखा है और उनके द्वारा धार्मिक सहनशीलता का उदाहरण अनुकरणीय है।

दक्षिण का चोल राजवंश

यह भारतीय महाद्वीप के एक बड़े हिस्‍से को शामिल करते हुए नौवीं शताब्‍दी ए.डी. के मध्‍य में उभरा साथ ही यह श्रीलंका तथा मालदीव में भी फैला था।

इस राजवंश से उभरने वाला प्रथम महत्‍वपूर्ण शासक राजराजा चोल 1 और उनके पुत्र तथा उत्तरवर्ती राजेन्‍द्र चोल थे। राजराजा ने अपने पिता की जोड़ने की नीति को आगे बढ़ाया। उसने बंगाल, उड़ीसा और मध्‍य प्रदेश के दूरदराज के इलाकों पर सशस्‍त्र चढ़ाई की।

राजेन्‍द्र I, राजाधिराज और राजेन्‍द्र II के उत्तरवर्ती निडर शासक थे जो चालुक्‍य राजाओं से आगे चलकर वीरतापूर्वक लड़े किन्‍तु चोल राजवंश के पतन को रोक नहीं पाए। आगे चलकर चोल राजा कमजोर और अक्षम शासक सिद्ध हुए। इस प्रकार चोल साम्राज्‍य आगे लगभग डेढ़ शताब्‍दी तक आगे चला और अंतत: चौदहवीं शताब्‍दी ए.डी. की शुरूआत में मलिक कफूर के आक्रमण पर समाप्‍त हो गया।

Freedom Struggle / स्वतंत्रता संग्राम

पुराने समय में जब पूरी दुनिया के लोग भारत आने के लिए उत्‍सुक रहा करते थे। यहां आर्य वर्ग के लोग मध्‍य यूरोप से आए और भारत में ही बस गए। उनके बाद मुगल आए और वे भी भारत में स्‍थायी रूप से बस गए। चंगेज़खान, एक मंगोलियाई था जिसने भारत पर कई बार आक्रमण किया और लूट पाट की। अलेक्‍ज़ेडर महान भी भारत पर विजय पाने के लिए आया किन्‍तु पोरस के साथ युद्ध में पराजित होकर वापस चला गया। हेन सांग नामक एक चीनी नागरिक यहां ज्ञान की तलाश में आया और उसने नालंदा तथा तक्षशिला विश्‍वविद्यालयों में भ्रमण किया जो प्राचीन भारतीय विश्‍वविद्यालय हैं। कोलम्‍बस भारत आना चाहता था किन्‍तु उसने अमेरिका के तटों पर उतरना पसंद किया। पुर्तगाल से वास्‍को डिगामा व्‍यापार करने अपने देश की वस्‍तुएं लेकर यहां आया जो भारतीय मसाले ले जाना चाहता था। यहां फ्रांसीसी लोग भी आए और भारत में अपनी कॉलोनियां बनाई।

अंत में ब्रिटिश लोग आए और उन्‍होंने लगभग 200 साल तक भारत पर शासन किया। वर्ष 1757 ने प्‍लासी के युद्ध के बाद ब्रिटिश जनों ने भारत पर राजनैतिक अधिकार प्राप्‍त कर लिया। और उनका प्रभुत्‍व लॉर्ड डलहौजी के कार्य काल में यहां स्‍थापित हो गया जो 1848 में गवर्नर जनरल बने। उन्‍होंने पंजाब, पेशावर और भारत के उत्तर पश्चिम से पठान जनजातियों को संयुक्‍त किया। और वर्ष 1856 तक ब्रिटिश अधिकार और उनके प्राधिकारी यहां पूरी मजबूती से स्‍थापित हो गए। जबकि ब्रिटिश साम्राज्‍य में 19वीं शताब्‍दी के मध्‍य में अपनी नई ऊंचाइयां हासिल की, असंतुष्‍ट स्‍थानीय शासकों, मजदूरों, बुद्धिजीवियों तथा सामान्‍य नागरिकों ने सैनिकों की तरह आवाज़ उठाई जो उन विभिन्‍न राज्‍यों की सेनाओं के समाप्‍त हो जाने से बेरोजगार हो गए थे, जिन्हें ब्रिटिश जनों ने संयुक्‍त किया था और यह असंतोष बढ़ता गया। जल्‍दी ही यह एक बगावत के रूप में फूटा जिसने 1857 के विद्रोह का आकार‍ लिया।

1857 में भारतीय विद्रोह

भारत पर विजय, जिसे प्‍लासी के संग्राम (1757) से आरंभ हुआ माना जा सकता है, व्‍यावहारिक रूप से 1856 में डलहौजी के कार्यकाल का अंत था। किसी भी अर्थ में यह सुचारु रूप से चलने वाला मामला नहीं था, क्‍योंकि लोगों के बढ़ते असंतोष से इस अवधि के दौरान अनेक स्‍थानीय प्रांतियां होती रहीं। यद्यपि 1857 का विद्रोह, जो मेरठ में सैन्‍य कर्मियों की बगावत से शुरू हुआ, जल्‍दी ही आगे फैल गया और इससे ब्रिटिश शासन को एक गंभीर चुनौती मिली। जबकि ब्रिटिश शासन इसे एक वर्ष के अंदर ही दबाने में सफल रहा, यह निश्चित रूप से एक ऐसी लोकप्रिय क्रांति थी जिसमें भारतीय शासक, जनसमूह और नागरिक सेना शामिल थी, जिसने इतने उत्‍साह से इसमें भाग लिया कि इसे भारतीय स्‍वतंत्रता का पहला संग्राम कहा जा सकता है।

ब्रिटिश द्वारा जमीनदारी प्रथा को शुरू करना, जिसमें मजदूरों को भारी करों के दबाव से कुचल डाला गया था, इससे जमीन के मालिकों का एक नया वर्ग बना। दस्‍तकारों को ब्रिटिश निर्मित वस्‍तुओं के आगमन से नष्‍ट कर दिया गया। धर्म और जाति प्रथा, जिसने पारम्‍परिक भारतीय समाज की सुदृढ़ नींव बनाई थी अब ब्रिटिश प्रशासन के कारण खतरे में थी। भारतीय सैनिक और साथ ही प्रशासन में कार्यरत नागरिक वरिष्‍ठ पदों पर पदोन्‍नत नहीं किए गए, क्‍योंकि ये यूरोपियन लोगों के लिए आरक्षित थे। इस प्रकार चारों दिशाओं में ब्रिटिश शासन के खिलाफ असंतोष और बगावत की भावना फैल गई, जो मेरठ में सिपाहियों के द्वारा किए गए इस बगावत के स्‍वर में सुनाई दी जब उन्‍हें ऐसी कारतूस मुंह से खोलने के लिए कहा गया जिन पर गाय और सुअर की चर्बी लगी हुई थी, इससे उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हुईं। हिन्‍दु तथा मुस्लिम दोनों ही सैनिकों ने इन कारतूसों का उपयोग करने से मना कर दिया, जिन्‍हें 9 मई 1857 को अपने साथी सैनिकों द्वारा क्रांति करने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया।

बगावती सेना ने जल्‍दी ही दिल्‍ली पर कब्‍जा कर लिया और यह क्रांति एक बड़े क्षेत्र में फैल गई और देश के लगभग सभी भागों में इसे हाथों हाथ लिया गया। इसमें सबसे भयानक युद्ध दिल्‍ली, अवध, रोहिलखण्‍ड, बुंदेल खण्‍ड, इलाहबाद, आगरा, मेरठ और पश्चिमी बिहार में लड़ा गया। विद्रोही सेनाओं में बिहार में कंवर सिंह के तथा दिल्‍ली में बख्‍तखान के नेतृत्‍व में ब्रिटिश शासन को एक करारी चोट दी। कानपुर में नाना साहेब ने पेशावर के रूप में उद्घघोषणा की और तात्‍या टोपे ने उनकी सेनाओं का नेतृत्‍व किया जो एक निर्भीक नेता थे। झांसी की रानी लक्ष्‍मी बाई ने ब्रिटिश के साथ एक शानदार युद्ध लड़ा और अपनी सेनाओं का नेतृत्‍व किया। भारत के हिन्‍दु, मुस्लिक, सिक्‍ख और अन्‍य सभी वीर पुत्र कंधे से कंधा मिलाकर लड़े और ब्रिटिश राज को उखाड़ने का संकल्‍प लिया। इस क्रांति को ब्रिटिश राज द्वारा एक वर्ष के अंदर नियंत्रित कर लिया गया जो 10 मई 1857 को मेरठ में शुरू हुई और 20 जून 1858 को ग्‍वालियर में समाप्‍त हुई।

Monuments / स्मारक

Agra Fort / आगरे का किला Kamakhya Temple / कामाख्‍या मंदिर
Ajanta & Ellora Caves / अजंता और ऐल्‍लोरा गुफाएं Kashi Vishwanath / काशी विश्‍वनाथ
Amer Fort / आमेर का किला Kye Monastery / क्‍ये मठ
Bahai Temple / बहाई मंदिर Humayun's Tomb / हुमायूं का मकबरा
Bara Imambara / बड़ा इमामबाड़ा Khajuraho Group of Monuments / खजुराहो स्‍मारक समूह
Basilica of Bom Jesus /बेसिलिका ऑफ बॉम जीसस Mahabodhi Temple Complex at Bodh Gaya / महाबोधि मंदिर संकुल, बोध गया
Brhadisvara Temple at Thanjavur / बृहदेश्‍वर मंदिर - तंजौर Meenakshi Temple / मीनाक्षी मंदिर
Charminar / चारमीनार Mehrangarh Fort / मेहरानगढ़ का किला
City Palace, Udaipur / सिटी पैलेस, उदयपुर Mysore Palace / मैसूर का महल
Dilwara Temples / दिलवाड़ा मंदिर Nalanda / नालंदा
Buddhist Monuments at Sanchi / सांची में बौद्ध स्‍तूप Purana Quila / पुराना किला
Chhatrapati Shivaji Terminus / छत्रपति शिवाजी टर्मिनस Qutub Minar and its Monuments / कुतुब मीनार और उसके स्मारक
Chola Temples / चोला मंदिर Rashtrapati Bhawan / राष्‍ट्रपति भवन
Churches and Convents of Goa / गोवा के गिरजा घर और कॉन्‍वेंट Red Fort / लाल किला
Elephanta Caves / एलीफेंटा गुफाएं Rock Shelters of Bhimbetka / भीमबेटका की पहाड़ी गुफाएं
Fatehpur Sikri / फतेहपुर सीकरी Sé Cathedral / सेंट केथेड्रल
Gateway of India / गेटवे ऑफ इंडिया Sheesh Mahal / शीश महल
Gingee Fort / जिंजी किला Sikandra Fort / सिकंदरा का किला
Golconda Fort / गोलकोंडा किला Sun Temple, Konark / सूर्य मंदिर, कोणार्क
Golden Temple / स्‍वर्ण मंदिर Taj Mahal / ताजमहल
Group of Monuments at Hampi / हम्‍पी में स्‍मारकों का समूह Victoria Memorial / विक्‍टोरिया मेमोरियल
Gwalior fort / ग्‍वालियर का किला  
Group of Monuments at Pattadakal / पट्टा डक्‍कल में स्‍मारकों का समूहों  
Group of Monuments at Mahabalipuram / महाबलीपुरम में स्‍मारकों का समूह  
Hawa Mahal / हवा महल  
Hill Palace Museum / हिल पैलेस संग्रहालय  
India Gate / इंडिया गेट  
Jaisalmer Fort / जैसलमेर का किला  
Jama Masjid / जामा मस्जिद  
Jantar Mantar / जंतर मंतर  

People and Lifestyle / लोग और जीवनशैली

Lifestyle, Values and Beliefs / जीवन शैली, मूल्य और मान्यताएं

भारत एक विविध संस्‍कृति वाला देश है, एक तथ्‍य कि यहां यह बात इसके लोगों, संस्‍कृति और मौसम में भी प्रमुखता से दिखाई देती है। हिमालय की अनश्‍वर बर्फ से लेकर दक्षिण के दूर दराज में खेतों तक, पश्चिम के रेगिस्‍तान से पूर्व के नम डेल्‍टा तक, सूखी गर्मी से लेकर पहाडियों की तराई के मध्‍य पठार की ठण्‍डक तक, भारतीय जीवनशैलियां इसके भूगोल की भव्‍यता स्‍पष्‍ट रूप से दर्शाती हैं।

एक भारतीय के परिधान, भोजन और आदतें उसके उद्भव के स्‍थान के अनुसार अलग अलग होते हैं।

संस्‍कृति

भारतीय संस्‍कृति अपनी विशाल भौगोलिक स्थिति के समान अलग अलग है। यहां के लोग अलग अलग भाषाएं बोलते हैं, अलग अलग तरह के कपड़े पहनते हैं, भिन्‍न भिन्‍न धर्मों का पालन करते हैं, अलग अलग भोजन करते हैं किन्‍तु उनका स्‍वभाव एक जैसा होता है। तो चाहे यह कोई खुशी का अवसर हो या कोई दुख का क्षण, लोग पूरे दिल से इसमें भाग लेते हैं, एक साथ खुशी या दर्द का अनुभव करते हैं। एक त्‍यौहार या एक आयोजन किसी घर या परिवार के लिए सीमित नहीं है। पूरा समुदाय या आस पड़ासे एक अवसर पर खुशियां मनाने में शामिल होता है, इसी प्रकार एक भारतीय विवाह मेल जोल का आयोजन है, जिसमें न केवल वर और वधु बल्कि दो परिवारों का भी संगम होता है। चाहे उनकी संस्‍कृति या धर्म का मामला हो। इसी प्रकार दुख में भी पड़ोसी और मित्र उस दर्द को कम करने में एक महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

विज्ञान

भारत की वैश्विक छवि एक उभरते हुए और प्रगतिशील राष्‍ट्र की है। सच ही है, भारत में सभी क्षेत्रों में कई सीमाओं को हाल के वर्षों में पार किया है, जैसे कि वाणिज्‍य, प्रौद्योगिकी और विकास आदि, और इसके साथ ही उसने अपनी अन्‍य रचनात्‍मक बौद्धिकता को उपेक्षित भी नहीं किया है। आपको आश्‍चर्य है कि यह क्‍या है तो यह वैकल्पिक विज्ञान है, जिसका निरंतर अभ्‍यास भारत में अनंतकाल से किया जाता है। आयुर्वेद पूरी तरह से जड़ी बूटियों और प्राकृतिक खरपतवार से बनी दवाओं का एक विशिष्‍ट रूप है जो दुनिया की किसी भी बीमारी का इलाज कर सकती हैं। आयुर्वेद का उल्‍लेख प्राचीन भारत के एक ग्रंथ रामायण में भी किया गया है। और आज भी दवाओं की पश्चिमी संकल्‍पना जब अपने चरम पर पहुंच गई है, ऐसे लोग हैं जो बहु प्रकार की विशेषताओं के लिए इलाज की वैकल्पिक विधियों की तलाश में हैं।

आज के समय में व्‍यक्ति के जीवन की बढ़ती जटिलताओं के साथ लोग निरंतर ऐसे माध्‍यम की खोज कर रहे हैं, जिसके जरिए वे मन की कुछ शांति पा सकें। यहां एक और विज्ञान है, जिसे हम ध्‍यान के नाम से जानते हैं तथा इसके साथ जुड़ी है आध्‍यात्मिकता। ध्‍यान और योग भारत तथा भारतीय आध्‍यात्मिकता के समानार्थी हैं। ध्‍यान लगाना योग का सबसे महत्‍वपूर्ण घटक है, जो व्‍यायामों की एक श्रृंखला सहित मन और शरीर का उपचार है। ध्‍यान शब्‍द में अनेक अभ्यास शामिल हैं जो परिस्थितियों को साकार रूप में देखने, एक वस्‍तु या छवियों पर ध्‍यान केन्द्रित करने, एक जटिल विचार के माध्‍यम से सोचने अथवा एक उत्तेजक पुस्‍तक में हो जाने को भी शामिल करती हैं, ये सभी मोटे तौर पर ध्‍यान के प्रकार हैं। जबकि योग में ध्‍यान का अर्थ सामान्‍य रूप से मन को अधिक औपचारिक रूप से केन्द्रित करने और स्‍वयं को एक क्षण में देखने से संदर्भित किया जाता है। भारत और विदेश के कई लोग तनाव से छुटकारा पाने और मन को ताजा बनाने के लिए योग तथा ध्‍यान का आश्रय लेते हैं।

भारत में एक अन्‍य व्‍यापक रूप से प्रचलित विचाराधारा है कर्म की विचाराधारा, जिसके अनुसार प्रत्‍येक व्‍यक्ति को केवल सही कार्य करना चाहिए या एक व्‍यक्ति के रूप में इसके जीवन के पूर्ण वृत्त में वे ही तथ्‍य उसके सामने आते हैं।

पिछले दिनों भारत का एक अन्‍य महत्‍वपूर्ण पक्ष नए युग की महिला का प्रादुर्भाव है। भारत में महिलाएं मुख्‍य रूप से गृहिणियां हैं, जबकि अब यह परिदृश्‍य बदल रहा है। अनेक स्‍थानों पर, विशेष रूप से महानगरों और अन्‍य शहरों में महिलाएं घर के लिए रोजीरोटी कमाते हैं और वे अपने पुरुष साथियों के बराबर कार्य करती हैं। जीवन की लागत / अर्थव्‍यवस्‍थ में हुई वृद्धि से इस पक्ष के उठने में योगदान मिला है।

भारतीय नागरिकों की सुंदरता उनकी सहनशीलता, लेने और देने की भावना तथा उन संस्‍कृतियों के मिश्रण में निहित है जिसकी तुलना एक ऐसे उद्यान से की जा सकती है जहां कई रंगों और वर्णों के फूल है, जबकि उनका अपना अस्तित्‍व बना हुआ है और वे भारत रूपी उद्यान में भाईचारा और सुंदरता बिखेरते हैं।

Ethnicity of India / भारत की जातीयता

दिनांक 1 मार्च 2001 की जनगणना के अनुसार 1,027 मिलियन से अधिक जनसंख्‍या वाला भारत, विभिन्‍न संस्‍कृतियों और धर्मों के जातीय गुणों के बेजोड़ आत्‍मसातकरण को दर्शाता व चित्रित करता एक रंगीन केनवास है। वस्‍तुत: देश की यह जातीयता वह कारक है जो इसे अन्‍य राष्‍ट्रों से अलग बनाती है। इसके अलावा, सांस्‍कृतिक अतिरंजिका के आधिक्‍य, धर्मों इत्‍यादि, को ध्‍यान में रखते हुए भारत की राष्‍ट्रीयता की व्‍यापकता, एक आधार वाक्‍य है जिसके कारण देश को मात्र एक राष्‍ट्र-राज्‍य के रूप में देखने के बजाए बड़ी विश्‍व सभ्‍यता की आधार शिला के रूप में देखा जाता है।

प्राचीन समय से ही, भारत की आध्‍यात्मिक भूमि ने संस्‍कृति धर्म, जाति भाषा इत्‍यादि के विभिन्‍न वर्ण प्रदर्शित किए हैं। जाति, संस्‍कृति, धर्म इत्‍यादि की यह विभिन्‍नता अलग-अलग उन जातीय वर्गों, के अस्तित्‍व की गवाही देती है, जो यद्यपि एक राष्‍ट्र के पवित्र गृह में रहते हैं, परन्‍तु विभिन्‍न सामाजिक रिवाजों और अभिलक्षणों को मानते हैं। भारत की क्षेत्रीय सीमाएं, इन जातीय वर्गों में उनकी अपनी सामाजिक व सांस्‍कृतिक पहचान के आधार पर भेद करने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत में जो धर्म विद्यमान हैं वे हैं हिन्‍दू धर्म, ईसाई धर्म, इस्‍लाम, सिक्‍ख, धर्म, बुद्ध धर्म, और जैन धर्म। नागरिकों को, जिस भी धर्म को वे चाहते हैं, अपनाने की स्‍वतंत्रता है। देश में 35 अलग-अलग राज्‍यों व केंद्रशासित क्षेत्रों का संचालन करते समय, विभिन्‍न राज्‍यों द्वारा, संस्‍कृतियों के प्रदर्शन से विभिन्‍न भागों में क्षेत्रीयता की भावना उत्‍पन्‍न हुई है। जो हालांकि राष्‍ट्रीय सांस्‍कृतिक पहचान दर्शाने के लिए अंतत: एक सामान्‍य बंधन से मिल जुल जाती है। भारतीय संविधान ने, देश में प्रचलित विभिन्‍न 22 भाषाओं को मान्‍यता प्रदान की है। जिनमें से हिंदी राजभाषा है तथा भारत के अधिकांश नगरों व शहरों में बोली जाती है। इन 22 भाषाओं के अलावा, सैकड़ों बोलियां भी हैं जो देश की बहुभाषी प्रकृति में योगदान करती हैं।

Festivals / त्यौहार

भारत त्‍यौहार और मेलों का देश है। वस्‍तुत: वर्ष के प्रत्‍येक दिन उत्‍सव मनाया जाता है। पूरे विश्‍व की तुलना में भारत में अधिक त्‍यौहार मनाए जाते हैं। प्रत्‍येक त्‍यौहार अलग अवसर से संबंधित है, कुछ वर्ष की ऋतुओं का, फसल कटाई का, वर्षा ऋतु का अथवा पूर्णिमा का स्‍वागत करते हैं। दूसरों में धार्मिक अवसर, ईश्‍वरीय सत्‍ता/परमात्‍मा व संतों के जन्‍म दिन अथवा नए वर्ष की शरूआत के अवसर पर मनाए जाते हैं। इनमें से अधिकांश त्‍यौहार भारत के अधिकांश भागों में समान रूप से मनाए जाते हैं। तथापि यह हो सकता है‍ कि उन्‍हें देश के विभिन्‍न भागों में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता हो अथवा अलग तरीके से मनाया जाता हो। कुछ ऐसे त्‍यौहार, जो पूरे भारत में मनाए जाते हैं, इन का उल्‍लेख नीचे किया गया है। तथापि इस खंड में अभी और वृद्धि की जा रही है। ऐसे और कई महत्‍वपूर्ण त्‍यौहार हैं जो भारत में विभिन्‍न जातियों द्वारा मनाए जाते हैं तथा इनके संबंध में और जानकारी उपलब्‍ध कराने के लिए इस खंड का भी आगे संवर्धन किया जाएगा

Janmashtami / जन्माष्टमी

जन्‍माष्‍टमी के त्‍यौहार में भगवान विष्‍णु की, श्री कृष्‍ण के रूप में, उनकी जयन्‍ती के अवसर पर प्रार्थना की जाती है। हिन्‍दुओं का यह त्‍यौहार श्रावण (जुलाई-अगस्‍त) के कृष्‍ण पक्ष की अष्‍टमी के दिन भारत में मनाया जाता है। हिन्‍दु पौराणिक कथा के अनुसार कृष्‍ण का जन्‍म, मथुरा के असुर राजा कंस, जो उसकी सदाचारी माता का भाई था, का अंत करने के लिए हुआ था।

जन्‍माष्‍टमी के अवसर पर पुरूष व औरतें उपवास व प्रार्थना करते हैं। मन्दिरों व घरों को सुन्‍दर ढंग से सजाया जाता है व प्रकाशित किया जाता है। उत्‍तर प्रदेश के वृन्‍दावन के मन्दिरों में इस अवसर पर खर्चीले व रंगारंग समारोह आयोजित किए जाते हैं। कृष्‍ण की जीवन की घटनाओं की याद को ताजा करने व राधा जी के साथ उनके प्रेम का स्‍मरण करने के लिए रास लीला की जाती है। इस त्‍यौहार को कृष्‍णाष्‍टमी अथवा गोकुलाष्‍टमी के नाम से भी जाना जाता है।


Christmas / क्रिसमस

क्रिसमस शब्‍द का जन्‍म क्राईस्‍टेस माइसे अथवा ‘क्राइस्‍टस् मास’ शब्‍द से हुआ है। ऐसा अनुमान है कि पहला क्रिसमस रोम में 336 ई. में मनाया गया था। यह प्रभु के पुत्र जीसस क्राइस्‍ट के जन्‍म दिन को याद करने के लिए पूरे विश्‍व में 25 दिसम्‍बर को मनाया जाता है यह ईसाइयों के सबसे महत्‍वपूर्ण त्‍यौहारों में से एक है। इस दिन भारत व अधिकांश अन्‍य देशों में सार्वजनिक अवकाश रहता है।

क्राइस्‍ट के जन्‍म के संबंध में नए टेस्‍टामेंट के अनुसार व्‍यापक रूप से स्‍वीकार्य ईसाई पौराणिक कथा है। इस कथा के अनुसार प्रभु ने मैरी नामक एक कुंवारी लड़की के पास गैब्रियल नामक देवदूत भेजा। गैब्रियल ने मैरी को बताया कि वह प्रभु के पुत्र को जन्‍म देगी तथा बच्‍चे का नाम जीसस रखा जाएगा। व‍ह बड़ा होकर राजा बनेगा, तथा उसके राज्‍य की कोई सीमाएं नहीं होंगी।


Rakshabandhan / रक्षाबंधन

हिन्‍दू श्रावण मास (जुलाई-अगस्‍त) के पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला यह त्‍यौहार भाई का बहन के प्रति प्‍यार का प्रतीक है। इस दिन बहन अपने भाइयों की कलाई में राखी बांधती है और उनकी दीर्घायु व प्रसन्‍नता के लिए प्रार्थना करती हैं ताकि विपत्ति के दौरान वे अपनी बहन की रक्षा कर सकें। बदले में भाई, अपनी बहनों की हर प्रकार के अहित से रक्षा करने का वचन उपहार के रूप में देते हैं। इन राखियों के बीच शुभ भावनाओं की पवित्र भावना होती है। यह त्‍यौहार मुख्‍यत: उत्‍तर भारत में मनाया जाता है।

रक्षा बंधन का इतिहास हिंदू पुराण कथाओं में है। हिंदू पुराण कथाओं के अनुसार, महाभारत में, (जो कि एक महान भारतीय महाकाव्‍य है) पांडवों की पत्‍नी द्रौपदी ने भगवान कृष्‍ण की कलाई से बहते खून (श्री कृष्‍ण ने भूल से खुद को जख्‍मी कर दिया था) को रोकने के लिए अपनी साड़ी का किनारा फाड़ कर बांधा था। इस प्रकार उन दोनो के बीच भाई और बहन का बंधन विकसित हुआ था, तथा श्री कृष्‍ण ने उसकी रक्षा करने का वचन दिया था।


Deepawali / दीपावली

दीपावली अथवा दीवाली, प्रकाश उत्‍सव है, जो सत्‍य की जीत व आध्‍यात्मिक अज्ञान को दूर करने का प्रतीक है। शब्‍द "दीपावली" का शाब्दिक अर्थ है दीपों (मिट्टी के दीप) की पंक्तियां। यह हिंदू कलेन्‍डर का एक बहुत लोकप्रिय त्‍यौहार है। यह कार्तिक के 15वें दिन (अक्‍तूबर/नवम्‍बर) में मनाया जाता है। यह त्‍यौहार भगवान राम के 14 वर्ष के बनवास के बाद अपने राज्‍य में वापस लौटने की स्‍मृति में मनाया जाता है।

भारत के सभी त्‍यौहारों में सबसे सुन्‍दर दीवाली प्रकाशोत्‍सव है। गलियां मिट्टी के दीपकों की पंक्तियों से प्रकाशित की जाती हैं तथा घरों को रंगों व मोमबत्तियों से सजाया जाता है। यह त्‍यौहार नए वस्‍त्रों, दर्शनीय आतिशबाजी और परिवार व मित्रों के साथ विभिन्‍न प्रकार की मिठाइयों के साथ मनाया जाता है। चूंकि यह प्रकाश व आतिशबाजी, खुशी व आनन्‍दोत्‍सव दैव शक्तियों की बुराई पर विजय की सूचक है।


Id-ul-Zuha / ईद उल जुहा

ईद-उल-जुहा (बकर-ईद) अत्‍यधिक खुशी, विशेष प्रार्थनाओं और अभिवादन करने का त्‍यौहार है और इस मुसलिम त्‍यौहार पर उपहार दिए जाते हैं। ईद-उल-जुहा, कुर्बानी का त्‍यौहार, भारत व विश्‍व में परंपरागत धर्मोत्‍साह और उल्‍लास के साथ मनाया जाता है। इसे, अरबी भाषा में ईद-उल-जुहा और भारतीय उप महाद्वीप में उर्दू में बकर-ईद कहा जाता है, क्‍योंकि इस दिन बकरे की कुर्बानी दी जाती है।

Ramnavami / रामनवमी

रामनवमी राजा दशरथ के पुत्र भगवान राम की स्‍मृति को समर्पित है। उसे "मर्यादा पुरूषोतम" कहा जाता है तथा वह सदाचार का प्रतीक है। यह त्‍यौहार शुक्‍ल पक्ष की 9वीं तिथि जो अप्रैल में किसी समय आती है, को राम के जन्‍म दिन की स्‍मृति में मनाया जाता है।

भगवान राम को उनके सुख-समृद्धि पूर्ण व सदाचार युक्‍त शासन के लिए याद किया जाता है। उन्‍हें भगवान विष्‍णु का अवतार माना जाता है, जो पृथ्‍वी पर अजेय रावण (मनुष्‍य रूप में असुर राजा) से युद्ध लड़ने के लिए आए। राम राज्‍य (राम का शासन) शांति व समृद्धि की अवधि का पर्यायवाची बन गया है।


Guru Nanak Jayanti / गुरु नानक जयंती

गुरू नानक जयन्‍ती, 10 सिक्‍ख गुरूओं के गुरू पर्वों या जयन्तियों में सर्वप्रथम है। यह सिक्‍ख पंथ के संस्‍थापक गुरू नानक देव, जिन्‍होंने धर्म में एक नई लहर की घोषणा की, की जयन्‍ती है। 10 गुरूओं में सर्व प्रथम गुरू नानक का जन्‍म 1469 में लाहौर के निकट तलवंडी में हुआ था। समाज में कई धर्मों के चलन व विभिन्‍न देवताओं को स्‍वीकार करने के प्रति अरुचि ने व्‍यापक यात्रा किए हुए नेता को धार्मिक विविधता के बंधन से मुक्‍त होने, तथा एक प्रभु जो कि शाश्‍वत सत्‍य है के आधार पर धर्म स्‍थापना करने की प्रेरणा दी। गुरू नानक जयन्‍ती के त्‍यौ‍हार में, तीन दिन का अखण्‍ड पाठ, जिसमें सिक्‍खों की धर्म पुस्‍तक "गुरू ग्रंथ साहिब" का पूरा पाठ बिना रुके किया जाता है, शामिल है। मुख्‍य कार्यक्रम के दिन गुरू ग्रंथ साहिब को फूलों से सजाया जाता है, और एक बेड़े (फ्लोट) पर रखकर जुलूस के रूप में पूरे गांव या नगर में घुमाया जाता है।

Organisations Engaged in Cultural Activities / सांस्कृतिक गतिविधियों में लगे संगठन

Ramakrishna Mission Institute of Culture, Kolkata / रामकृष्ण संस्कृति, कोलकाता मिशन संस्थान
Anthropological Survey of India / भारत के मानव विज्ञान सर्वेक्षण
Archaeological Survey of India / भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण
National Archives of India / भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार
National Mission for Manuscripts / पांडुलिपियों के लिए राष्ट्रीय मिशन
National Museum / राष्ट्रीय संग्रहालय
National Museum Institute of History of Art, Conservation and Musicology / राष्ट्रीय कला संरक्षण, और संगीत की विद्या का इतिहास के संग्रहालय संस्थानसंस्थान
National Library / राष्ट्रीय पुस्तकालय
Central Secretariat Library / केंद्रीय सचिवालय पुस्तकालय
Centre for Cultural Resources and Training / सांस्कृतिक संसाधन और प्रशिक्षण के लिए केन्द्र
Zonal Cultural Centres / क्षेत्रीय सांस्कृतिक केन्द्र
National Gallery of Modern Art / आधुनिक कला के राष्ट्रीय गैलरी
Indira Gandhi National Centre for the Arts / कला के लिए इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर
National Research Laboratory for Conservation of Cultural Property / राष्ट्रीय सांस्कृतिक संपत्ति के संरक्षण के लिए अनुसंधान प्रयोगशाला

 

National Academies / राष्ट्रीय अकादमी

Lalit Kala Akademi / ललित कला अकादमी

भारतीय कला के प्रति देश-विदेश में समझ बढ़ाने और प्रचार-प्रसार के लिए सरकार ने नई दिल्‍ली में 1954 में ललित कला अकादमी (नेशनल अकादमी ऑफ आर्ट्स) की स्‍थापना की थी। अकादमी के लखनऊ, कोलकाता, चेन्‍नई, नई दिल्‍ली और भुवनेश्‍वर में क्षेत्रीय केंद्र हैं जिन्‍हें राष्‍ट्रीय कला केंद्र के नाम से जाना जाता है। इन केंद्रों पर पेंटिंग, मूर्तिकला, प्रिंट-निर्माण और चीनी मिट्टी की कलाओं के विकास के लिए कार्यशाला-सुविधाएं उपलब्‍ध हैं।

अकादमी अपनी स्‍थापना से ही हर वर्ष समसामयिक भारतीय कलाओं की प्रदर्शनियां आयोजित करती रही है। 50-50 हजार रुपये के 15 राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार भी प्रदान किए जाते हैं। प्रत्‍येक तीन वर्ष पर अकादमी समकालीन कला पर नई दिल्‍ली में त्रैवार्षिक अंतर्राष्‍ट्रीय प्रदर्शनी (त्रिनाले इंडिया) आयोजित करती है।

आकदमी हर वर्ष जाने-माने कलाकारों और कलाक्षेत्र के इतिहासकारों को अपना फेलो चुनकर सम्‍मानित करती है। विदेशों में भारतीय कला के प्रचार-प्रसार के लिए अकादमी अंतर्राष्‍ट्रीय द्विवार्षिकियों और त्रिवार्षिकियों में नियमित रूप से भाग लेती है और अन्‍य देशों की कलाकृतियों की प्रदर्शनियां भी आयोजित करती है। देश के कलाकारों का अन्‍य देशों के कलाकारों के साथ मेलमिलाप और तालमेल बढ़ाने के उद्देश्‍य से अकादमी भारत सरकार के सांस्‍कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों और समझौतों के अंतर्गत कलाकारों को एक-दूसरे के यहां भेजने की व्‍यवस्‍था करती है।

ललित कला अकादमी कला संस्‍थाओं/संगठनों को मान्यता प्रदान करती है और इन संस्‍थाओं के साथ-साथ राज्‍यों की अकादमियों को आर्थिक सहायता देती है। यह क्षेत्रीय केंद्रों के प्रतिभावान युवा कलाकारों को छात्रवृत्ति भी प्रदान करती है। अपने प्रकाशन कार्यक्रम के तहत अकादमी समकालीन भारतीय कलाकारों की रचनाओं पर हिंदी और अंग्रेजी में मोनोग्राफ और समकालीन पारंपरिक तथा जनजातिय और लोक कलाओं पर जाने माने लेखकों और कला आलोचकों द्वारा लिखित पुस्‍तकें प्रकाशित करती है। अकादमी अंग्रेजी में 'ललित कला कंटेंपरेरि', 'ललित कला एंशिएंट' तथा हिंदी में 'समकालीन कला' नामक अर्द्धवार्षिक कला पत्रिकाएं भी प्रकाशित करती है। इसके अलावा अकादमी समय-समय पर समकालीन पंटिंग्‍स और ग्राफिक्‍स के बहुरंगी विशाल आकार के प्रतिफलक भी निकालती है। अकादमी ने अनुसंधान और अभिलेखन का नियमित कार्यक्रम भी शुरू किया है। भारतीय समाज और संस्‍कृति के विभिन्‍न पहलुओं से संबद्ध समसामयिक लोकला संबंधी परियोजना पर काम करने अकादमी विद्वानों को आर्थिक सहायता देती है।

Sangeet Natak Akademi / संगीत नाटक अकादमी

संगीत नाटक अकादमी (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं), नृत्‍य और नाटक की राष्‍ट्रीय अकादमी है जिसे आधुनिक भारत को निर्माण प्रक्रिया में प्रमुख योगदानकर्ता के रूप में याद किया जा सकता है, जिससे भारत को 1947 में स्‍वतंत्रता प्राप्‍त हुई थी। कलाओं के क्षणिक गुण-स्‍वभाव तथा उनके संरक्षण की आवश्‍यकता को देखते हुए इन्‍हें लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था में इस प्रकार समाहित हो जाना चाहिए कि समान्‍य व्‍यक्‍ति को इन्‍हें सीखने, अभ्‍यास करने और आगे बढ़ाने का अवसर प्राप्‍त हो सके। बीसवीं सदीं के शुरू के कुद दशकों में ही कलाओं के संरक्षण और विकास का दायित्‍व सरकार का समझा जाने लगा था।

इस आशय की पहली व्‍यापाक सार्वजनिक अपील 1945 में सरकार से की गई जब बंगाल की एशियाटिक सोसायटी ने प्रस्‍ताव प्रस्‍तुत किया कि एक राष्‍ट्रीय संस्‍कृति न्‍यास (नेशनल कल्‍चरल ट्रस्‍ट) बनाया जाए जिसमें तीन अकादमियां – नृत्‍य, नाटक एवं संगीत अकादमी, साहित्‍य अकादमी और कला एवं वास्‍तुकला अकादमी सम्‍मिलित हों।

इस समूचे मुद्दे पर स्‍वतंत्रता के पश्‍चात कोलकाता में 1949 में आयोजित कला सम्‍मेलन में तथा नई दिल्‍ली में 1951 में आयोजित साहित्‍य सम्‍मेलन तथा नृत्‍य, नाटक व संगीत सम्‍मेलन में फिर से विचार किया गया। भारत सरकार द्वारा आयोजित इन सम्‍मेलनों में अंतत: तीन राष्‍ट्रीय अकादमियां स्‍थापित करने की सिफ़ारिश की गई। इनमें से एक अकादमी नृत्‍य, नाटक और संगीत के लिए, एक साहित्‍य के लिए और एक कला के लिए स्‍थापित किए जाने का प्रस्‍ताव किया गया।

31 मई, 1952 को तत्‍कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के हस्‍ताक्षर से पारित प्रस्‍ताव द्वारा सबसे पहले नृत्‍य, नाटक और संगीत के लिए राष्‍ट्रीय अकादमी के रूप में संगीत नाटक अकादमी की स्‍थापना हुई। 28 जनवरी, 1953 को भारत के राष्‍ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संगीत नाटक अकादमी का विधिवत उद्धाटन किया।

National School of Drama / नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा

राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं) दुनिया में रंगमंच का प्रशिक्षण देने वाले श्रेष्‍ठतम संस्‍थानों में से एक है तथा भारत में यह अपनी तरह का एकमात्र संस्‍थान है जिसकी स्‍थापना संगीत नाटक अकादमी ने 1959 में की थी। इसे 1975 में स्‍वायत्त संगठन का दर्जा दिया गया जिसका पूरा खर्च संस्‍कृति विभाग वहन करता है। राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय का उद्देश्‍य रंगमंच के इतिहास, प्रस्‍तुतिकरण, दृश्‍य डिजाइन, वस्‍त्र डिजाइन, प्रकाश व्‍यवस्‍था और रूप-सज्‍जा सहित रंगमंच के सभी पहलुओं का प्रशिक्षण देना है। इस विद्यालय में प्रशिक्षण पाठ्यक्रम की अवधि तीन वर्ष है और हर वर्ष पाठ्यक्रम में 20 विद्यार्थी लिए जाते हैं। प्रवेश पाने के इच्‍छुक विद्यार्थियों को दो चरणों में से गुजरना पड़ता है। राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय के डिप्‍लोमा को भारतीय विद्यालय संघ की ओर से एम.ए. की डिग्री के बराबर मान्‍यता प्राप्‍त है और इसके आधार पर वे कॉलेजों/विश्‍वविद्यालयों में शिक्षक के रूप में नियुक्‍त किए जा सकते हैं अथवा पीएच.-डी. (डॉक्‍टरेट) उपाधि के लिए पंजीकरण करा सकते हैं।

Sahitya Akademi / साहित्य अकादमी

साहित्‍य अकादमी (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं) विभिन्‍न भाषाओं की कृतियों की राष्‍ट्रीय अकादमी है। इसका उद्देश्‍य प्रकाशन, अनुवाद गोष्‍ठियां, कार्यशालाएं आयोजित करके भारतीय साहित्‍य के विकास को बढ़ावा देना है। इसके तहत देशभर में सांस्‍कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम और साहित्य सम्मेलन भी आयोजित किए जाते हैं। अकादमी की स्‍थापना 1954 में स्‍वायत्त संस्‍था के रूप में की गई थी और इसके लिए धन की व्‍यवस्‍था भारत सरकार का संस्‍कृति विभाग करता है। अकादमी का समिति के रूप में पंजीकरण 1956 में हुआ था। अकादमी ने 24 भाषाओं को मान्‍यता दे रखी है। प्रत्‍येक भाषा के लिए एक सलाहकार बोर्ड है जो संबद्ध भाषा के कामकाज और प्रकाशान के बारे में सलाह देता है। अकादमी के चार क्षेत्रीय बोर्ड हैं जो उत्तर, पश्‍चिम, पूर्व और दक्षिण की भाषाओं के बीच तालमेल और परस्‍पर आदान-प्रदान को प्रोत्‍साहन देते हैं। अकादमी का मुख्‍यालय नई दिल्‍ली में है तथा कोलकाता, मुंबई, बैंगलोर और चेन्‍नई में भी इसके कार्यालय हैं। अकादमी के बैंगलोर और कोलकाता में दो अनुवाद केंद्र भी हैं। मौखिक और जनजातीय साहित्‍य को बढ़ावा देने के उद्देश्‍य से शिलांग में अकादमी का परियोजना कार्यालय स्‍थित है तथा दिल्‍ली में भारतीय साहित्‍य का अभिलेखागार है। नई दिल्‍ली में ही अकादमी का अनूठा बहुभाषीय पुस्‍तकालय भी है जिसके क्षेत्रीय कार्यालय बैंगलोर और कोलकाता में हैं। इनमें 25 से ज्‍यादा भाषाओं की करीब डेढ़ लाख पुस्‍तकों का संग्रह है।

Visual Arts and Literature / दृश्य कला और साहित्य

Literature / साहित्य

भारतीय साहित्‍य की परम्‍परा विश्‍व में सबसे प्राचीन है। प्रारम्‍भ में यह काव्‍य रूप में था जिसे गाकर सुनाया जाता था। साहित्‍य की प्रारम्भिक कृतियां गीत अथवा छन्‍द के रूप में होती थी। यह सिलसिला कई पी‍ढ़ियों तक चलता रहा और फिर साहित्‍य का यह लिपिबद्ध रूप सामने आया।

संस्‍कृत साहित्‍य

भारत में सरकारी तौर पर 22 भाषाओं को मान्‍यता दी गई है और पिछले कुछ समय में इन भाषाओं में एक विशाल साहित्‍य का संकलन हुआ है। अधिकांश भारतीय संस्‍कृति पर हिन्‍दू साहित्‍य परम्‍परा का प्रभाव है। वेदों के अलावा, जो कि एक धार्मिक ग्रंथ है, हिन्‍दू साहित्‍य की कई अन्‍य कृतियाँ हैं जैसे कि हिन्‍दू महाकाव्‍य रामायण और महाभारत, भवन-निर्माण और नगर आयोजना में वास्‍तुशिल्‍प त‍था राजनीतिविज्ञान में अर्थशास्‍त्र जैसे शोध ग्रंथ। संस्‍कृत की सर्वाधिक प्रसिद्ध हिन्‍दू कृतियां वेद, उपनिषद और मनुस्‍मृति हैं। दूसरा लोकप्रिय साहित्‍य है तमिल साहित्‍य, जिसकी 2000 वर्ष पुरानी साहित्‍य परम्‍परा बहुत ही समृद्ध है। यह साहित्‍य महाकाव्‍यों के रूप में अपने काव्‍यात्‍मक स्‍वरूप और दार्शनिक तथा लौकिक रचनाओं के लिए विशेष तौर पर जाना जाता है।

हिन्‍दी साहित्‍य

हिन्‍दी साहित्‍य का प्रारम्‍भ मध्‍यकाल में अवधी और ब्रज भाषाओं में धार्मिक और दार्शनिक काव्‍य रचनाओं से हुआ। इस काल के प्रसिद्ध कवियों में कबीर और तुलसीदास विख्‍यात हैं। आधुनिक युग में खड़ी बोली ज्‍यादा लोकप्रिय हो गई और संस्‍कृत में नानाविध साहित्‍य की रचना हुई।

देवकीनन्‍दन खत्री द्वारा लिखित चन्‍द्रकान्‍ता को हिन्‍दी गद्य की प्रथम कृति माना गया है। मुंशी प्रेमचन्‍द हिन्‍दी के प्रसिद्ध उपन्‍यासकार थे। मैथिलीशरण गप्‍त, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानन्‍दन पंत, महादेवी वर्मा और रामधारी सिंह दिनकर इस काल के अन्‍य प्रसिद्ध कवि थे।

अंग्रेजी साहित्‍य

भारत के आधुनिक काल में अन्‍य कई लेखकों को भी प्रसिद्धि मिली जैसे कि मुल्‍क राज आनन्‍द जिनकी प्रसिद्ध कृतियां थी 'अनटचेबल' (1935) और 'कुली' (1936), आर. के. नारायण जिन्‍होंने उपन्‍यास लिखे और दक्षिण भारत के गांव की कहानी लिखी जैसे कि 'स्‍वामी एण्‍ड फ्रेंड्स। युवा लेखकों में अनीता देसाई का नाम लिया जाता है जिन्‍होंने 'क्‍लीयर लाइट ऑफ दि डे' (1980) और 'इन कस्‍टडी' प्रसिद्ध उपन्‍यासों की रचना की।

अन्‍य सुविख्‍यात उपन्‍यासकारों/लेखकों के नाम इस प्रकार है: डॉम मोरेस, एन लिसिम ई जेघियल, पी. लाल, ए.के. रामानुजन, कमला दास, अरूण कोलटकर और आर. पार्थसारथी, राजा राव, जी.वी. देसाई, देसानी, एम. अनन्‍तनारायण, भदानी भट्टाचार्य, मनोहर मालगांवकर, नयनतारा सहगल, ओ. वी. विजयन, सलमान रशदी, श्री निसासन आयंगर, सीडी नरसिंहमन और एम.के. नायक।

Folk and Tribal Art / लोक और जनजातीय कला

हमेशा से ही भारत की कलाएं और हस्‍तशिल्‍प इसकी सांस्‍कृतिक और परम्‍परागत प्रभावशीलता को अभिव्‍यक्‍त करने का माध्‍यम बने रहे हैं। देश भर में फैले इसके 35 राज्‍यों और संघ राज्‍य क्षेत्रों की अपनी विशेष सांस्‍कृतिक और पारम्‍परिक पहचान है, जो वहां प्रचलित कला के भिन्‍न-भिन्‍न रूपों में दिखाई देती है। भारत के हर प्रदेश में कला की अपनी एक विशेष शैली और पद्धति है जिसे लोक कला के नाम से जाना जाता है। लोककला के अलावा भी परम्‍परागत कला का एक अन्‍य रूप है जो अलग-अलग जनजातियों और देहात के लोगों में प्रचलित है। इसे जनजातीय कला के रूप में वर्गीकृत किया गया है। भारत की लोक और जनजातीय कलाएं बहुत ही पारम्‍परिक और साधारण होने पर भी इतनी सजीव और प्रभावशाली हैं कि उनसे देश की समृ‍द्ध विरासत का अनुमान स्‍वत: हो जाता है।

भारत के कुछ प्रसिद्ध लोक एवं जनजातीय जनजाति कला के बारे में अधिक जानकारी

तंजौर कला

यह लोक कला कहानी किस्‍से सुनाने की विस्‍मृत कला से जुड़ी है। भारत के हर प्रदेश मे चित्रों का प्रयोग किसी बात की अभिव्‍यक्ति दृश्‍य चित्रण के माध्‍यम से करने के लिए किया जाता है जो कथन का ही एक प्रतिपक्षी रूप है। राजस्‍थान, गुजरात और बंगाल के ये कला रूप स्‍थान विशेष के वीरों और देवताओं की पौराणिक कथाएं सुनाती हैं और हमारे प्राचीन वैभव और भव्‍य सांस्‍कृतिक विरासत का बहुमूर्तिदर्शी चित्रण किया है। हर कृति अपने आप में एक पूर्ण वृतान्‍त है जो प्राचीन काल की एक झांकी प्रस्‍तुत करती है जिसे हमारे कलाकारों की प्रवीणता और निष्‍ठा ने जीवित रखा है।

मधुबनी चित्रकारी

मधुबनी चित्रकारी, जिसे मिथिला की कला (क्‍योंकि यह बिहार के मिथिला प्रदेश में पनपी थी) भी कहा जाता है, की विशेषता चटकीले और विषम रंगों से भरे गए रेखा-चित्र अथवा आकृतियां हैं। इस तरह की चित्रकारी पारम्‍परिक रूप से इस प्रदेश की महिलाएं ही करती आ रही हैं लेकिन आज इसकी बढ़ती हुई मांग को पूरा करने के लिए पुरूष भी इस कला से जुड़ गए हैं। ये चित्र अपने आदिवासी रूप और चटकीले और मटियाले रंगों के प्रयोग के कारण लोकप्रिय हैं। इस चित्रकारी में शिल्‍पकारों द्वारा तैयार किए गए खनिज रंजकों का प्रयोग किया जाता है। यह कार्य ताजी पुताई की गई अथवा कच्‍ची मिट्टी पर किया जाता है। वाणिज्यिक प्रयोजनों के लिए चित्रकारी का यह कार्य अब कागज़, कपड़े, कैन्‍वास आदि पर किया जा रहा है।

वार्ली लोक चित्रकला

महाराष्‍ट्र अपनी वार्ली लोक चित्रकला के लिए प्रसिद्ध है। वार्ली एक बहुत बड़ी जनजाति है जो पश्‍चिमी भारत के मुम्‍बई शहर के उत्तरी बाह्मंचल में बसी है। भारत के इतने बड़े महानगर के इतने निकट बसे होने के बावजूद वार्ली के आदिवासियों पर आधुनिक शहरीकरण कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। 1970 के प्रारम्‍भ में पहली बार वार्ली कला के बारे में पता चला। हालांकि इसका कोई लिखित प्रमाण तो नहीं मिलता कि इस कला का प्रारम्‍भ कब हुआ लेकिन दसवीं सदी ई.पू. के आरम्भिक काल में इसके होने के संकेत मिलते हैं। वार्ली, महाराष्‍ट्र की वार्ली जनजाति की रोजमर्रा की जिंदगी और सामाजिक जीवन का सजीव चित्रण है। यह चित्रकारी वे मिट्टी से बने अपने कच्‍चे घरों की दीवारों को सजाने के लिए करते थे। लिपि का ज्ञान नहीं होने के कारण लोक वार्ताओं (लोक साहित्‍य) के आम लोगों तक पहुंचाने को यही एकमात्र साधन था। मधुबनी की चटकीली चित्रकारी के मुकाबले यह चित्रकला बहुत साधारण है।

पत्ताचित्र चित्रकारी

चित्रकारी की पत्ताचित्र शैली उड़ीसा की सबसे प्राचीन और सर्वा‍धिक लोकप्रिय कला का एक रूप है। पत्ताचित्र का नाम संस्‍कृत के पत्ता जिसका अर्थ है कैनवास और चित्रा जिसका अर्थ है तस्‍वीर शब्‍दों से मिलकर बना है। इस प्रकार पत्ताचित्र कैनवास पर की गई एक चित्रकारी है जिसे चटकीले रंगों का प्रयोग करते हुए सुन्‍दर तस्‍वीरों और डिजाइनों में तथा साधारण विषयों को व्‍यक्‍त करते हुए प्रदर्शित किया जात है जिनमें अधिकांशत: पौराणिक चित्रण होता है। इस कला के माध्‍यम से प्रदर्शित एक कुछ लोकप्रिय विषय है: थे या वाधिया-जगन्‍नाथ मंदिर का चित्रण; कृष्‍णलीला-जगन्‍नाथ का भगवान कृष्‍ण के रूप में छवि जिसमें बाल रूप में उनकी शक्तियों को प्रदर्शित किया गया है; दसावतारा पति-भगवान विष्‍णु के दस अवतार; पंचमुखी-पांच सिरों वाले देवता के रूप में श्री गणेश जी का चित्रण। सबसे बढ़कर विषय ही साफ तौर पर इस कला का सार है जो इस चित्रों अर्थ को परिकल्पित करते हैं।

राजस्‍थानी लघु चित्रकारी

भारत में लघु चित्रकारी की कला का प्रारम्‍भ मुगलों द्वारा किया गया जो इस भव्‍य अलौकिक कला को फ़राज (पार्शिया) से लेकर आए थे। छठी शताब्‍दी में मुगल शासक हुमायुं ने फराज से कलाकारों को बुलवाया जिन्‍‍हें लघु चित्रकारी में विशेषज्ञता प्राप्‍त थी। उनके उत्तराधिकारी मुगल बादशाह अकबर ने इस भव्‍य कला को बढ़ावा देने के प्रयोजन से उनके लिए एक शिल्‍पशाला बनवाई। इन कलाकारों ने अपनी ओर से भारतीय कलाकारों को इस कला का प्रशिक्षण दिया जिन्‍होंने मुगलों के राजसी और रोमांचक जीवन-शैली से प्रभावित होकर एक नई विशेष तरह की शैली में चित्र तैयार किए। भारतीय कलाकारों द्वारा अपनर इस खास शैली में तैयार किए गए विशेष लघु चित्रों को राजपूत अथवा राजस्‍थानी लघु चित्र कहा जाता है। इस काल में चित्रकला के कई स्‍कूल शुरू किए गए, जैसे कि मेवाड (उदयपुर), बंदी, कोटा, मारवाड़ (जोधपुर), बीकानेर, जयपुर और किशनगढ़।


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World Heritage Sites / विश्व विरासत साइटें

मानवता के लिए अत्यंत महत्व की जगह, जो आगे आने वाली पीढि़यों के लिए बचाकर रखी जानी होती हैं, उन्हें विश्व धरोहर स्थल (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं) के रूप में जाना जाता है। ऐसे महत्वपूर्ण स्थलों के संरक्षण की पहल यूनेस्को द्वारा की गई। इस आशय की एक अंतर्राष्ट्रीय संधि जो कि विश्व सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर संरक्षण की बात करती है के 1972 में लागू की गई।

विश्व धरोहर समिति इस संधि के तहत् निम्न तीन श्रेणियों में आने वाली संपत्तियों को शामिल करती है -

प्राकृतिक धरोहर स्थल - ऐसी धरोहर भौतिक या भौगोलिक प्राकृतिक निर्माण का परिणाम या भौतिक और भौगोलिक दृष्टि से अत्यंत सुंदर या वैज्ञानिक महत्व की जगह या भौतिक और भौगोलिक महत्व वाली यह जगह किसी विलुप्ति के कगार पर खड़े जीव या वनस्पति का प्राकृतिक आवास हो सकती है।

सांस्कृतिक धरोहर स्थल - इस श्रेणी की धरोहर में स्मारक, स्थापत्य की इमारतें, मूर्तिकारी, चित्रकारी, स्थापत्य की झलक वाले, शिलालेख, गुफा आवास और वैश्विक महत्व वाले स्थान; इमारतों का समूह, अकेली इमारतें या आपस में संबद्ध इमारतों का समूह; स्थापत्य में किया मानव का काम या प्रकृति और मानव के संयुक्त प्रयास का प्रतिफल, जो कि ऐतिहासिक, सौंदर्य, जातीय, मानवविज्ञान या वैश्विक दृष्टि से महत्व की हो, शामिल की जाती हैं।

मिश्रित धरोहर स्थल - इस श्रेणी के अंतर्गत् वह धरोहर स्थल आते हैं जो कि प्राकृतिक और सांस्कृतिक दोनों ही रूपों में महत्वपूर्ण होती हैं।

भारत को विश्व धरोहर सूची में 14 नवंबर 1977 में स्थान मिला। तब से अब तक पांच भारतीय स्थलों को विश्व धरोहर स्थल के रूप में घोषित किया जा चुका है। इसके अलावा फूलों की घाटी को नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के एक भाग रूप में इस सूची में शामिल कर लिया गया है।

भारतीय विश्व धरोहर स्थल -

1.काजीरंगा राष्ट्रीय पार्क (1985)
2.केवलादेव राष्ट्रीय पार्क (1985)
3.मानस वन्यजीव सेंक्चुरी (1985)
4.नंदा देवी (1988) तथा फूलों की घाटी (2005), नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के विस्तार के रूप में
5.सुदरबन राष्ट्रीय पार्क (1987)

Related Links / संबंधित लिंक्स
    World Heritage Sites in India / भारत में विश्व धरोहर स्थलों
    UNESCO World Heritage Centre - India / यूनेस्को की विश्व विरासत केंद्र - भारत

Performing Arts / कला प्रदर्शन

संगीत

भारत में शास्‍त्रीय संगीत की दो प्रमुख विधाएं – हिंदुस्‍तानी और कर्नाटक – गुरू-शिष्‍य परंपरा का निर्वाह करती चली आ रही हैं। इसी परंपरा ने घरानों और संप्रदायों की स्‍थापना की प्रेरणा दी जो बराबर आगे बढ़ रही है।

नृत्‍य

भारत में नृत्‍य परंपरा 2000 वर्षों से भी ज्‍यादा वर्षों से निरंतर चली आ रही है। नृत्‍य की विषयवस्‍तु धर्मग्रंथों, लोककथाओं और प्राचीन साहित्‍य पर आधारित रहती है। इसकी दो प्रमुख शैलियां हैं – शास्‍त्रीय नृत्‍य और लोकनृत्‍य। शास्‍त्रीय नृत्‍य वास्‍तव में प्राचीन नृत्‍य परंपराओं पर आधारित है और इनकी प्रस्‍तुति के नियम कठोर हैं। इनमें प्रमुख हैं – 'भरतनाट्यम', 'कथकली', 'कत्‍थक', 'मणिपुरी', 'कुचिपुड़ी' और 'ओडिसी'। 'भरतनाट्यम' मुख्‍यत: तमिलनाडु का नृत्‍य है और अब यह अखिल भारतीय स्‍वरूप ले चुका है। 'कथकली' केरल की नृत्‍यशैली है। 'कत्‍थक' भारतीय संस्‍कृति पर मुगल प्रभाव से विकसित नृत्‍य का एक अहम शास्‍त्रीय रूप है। 'मणिपुरी' नृत्‍यशैली में कोमलता और गीतात्‍मकता है जबकि 'कुचिपुड़ी' की जड़ें आंध्र प्रदेश में हैं। उड़ीसा का 'ओडिसी' प्राचीनकाल में मंदिरों में नृत्‍य रूप में प्रचलित था जो अब समूचे भारत में प्रचलित है। लोकनृत्‍य और आदिवासी नृत्‍य की भी विभिन्‍न शैलियां प्रचलित हैं।

शास्‍त्रीय और लोकनृत्‍य दोनों को लोकप्रिया बनाने का श्रेय संगीत नाटक अकादमी, तथा अन्य प्रशिक्षण संस्‍थानों और सांस्‍कृतिक संगठनों को जाता है। अकादमी सांस्‍कृतिक संस्‍थानों को आर्थिक सहायता देती है और नृत्‍य तथा संगीत की विभिन्‍न शैलियों में विशेषत: जो दुर्लभ हैं, को बढ़ावा देने तथा उच्‍चशिक्षा और प्रशिक्षण के लिए अध्‍ययेताओं, कलाकारों और अध्‍यापकों को फेलोशिप प्रदान करती है।

रंगमंच

भारत में रंगमंच उतना ही पुराना है जितना संगीत और नृत्‍य। शास्‍त्रीय रंगमंच तो अब कहीं-कहीं जीवित है। लोक रंगमंच को अनेक क्षेत्रीय रूपों में विभिन्‍न स्‍थानों पर देखा जा सकता है। इनके अलावा शहरों में पेशेवर रंगमंच भी हैं। भारत में कठपुतली रंगमंच की समृद्ध परंपरा रही है जिनमें सजीव कठपुतलियां, छड़ियों पर चलने वाली कठपुतलियां, दस्‍ताने वाली कठपुतलियां और चमड़े वाली कठपुतलियां (समानांतर रंगमंच) प्रचलित हैं। अनेक अर्द्ध-व्‍यावसायिक और शौकियां रंगमंच समूह भी हैं जो भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी में नाटकों का मंचन करते हैं।

Related Links / संबंधित लिंक्स
    Indian arts and literature / भारतीय कला और साहित्य